|
पुराण
हिंदुओं
के धार्मिक तथा
उसके अतिरिक्त
साहित्य में
पुराणों का
भी विशेष महत्व
है। पुराणों
को हिन्दुत्व
का धार्मिक,
दार्शनिक,ऐतिहासिक,वैयत्तिक,सामाजिक
और राजनैतिक
सस्कृति का
लोकसंमत विश्वकोष
समझा जा सकता
है। सामान्यतः
इनके पाँच लक्षण
बतलाए गये हैः-(१)
सर्ग
(सृष्टि),
(२)
प्रतिसर्ग
(लय
और पुनः सृष्टि),
(३)
वंश
(देवताओं
की वंशावली),
(४)
मन्वन्तर
(मनु
के काल बिभाग)
और
(५)
वंशानुचरित
(राजाओं
के वंशवृत)।
श्रीमद्भा०
११।७।९-१०
में पुराणों
के दस लक्षण
माने गये है
जिसमें उपरोक्त
के अतिरिक्त
वृत्ति,
रक्षा(ईश्वरावतार),
मुक्ति,
हेतु
(जीव)
और
अपाश्रय (ब्रह्म)
और
होने चाहिये।
पुराणों की
संख्या अठारह
मानी गई है,
जो
निम्न हैं-
(१)-ब्रह्म
पुराण,
(२)-पद्म
पुराण,
(३)-विष्णु
पुराण,
(४)-वायु
पुराण,
(५)-भागवत
पुराण,
(६)-नारद
पुराण,
(७)-मार्कण्डेय
पुराण,
(८)-अग्नि
पुराण,
(९)-भविष्य
पुराण,
(१०)-ब्रह्मवैवर्त्त
पुराण,
(११)-वराह
पुराण,
(१२)-लिङ्ग
पुराण,
(१३)-स्कन्द
पुराण,
(१४)-वामन
पुराण,
(१५)-कूर्म
पुराण,
(१६)-मत्स्य
पुराण,
(१७)-गरुड़
पुराण और
(१८)-ब्रह्मांड
पुराण ।
पुराणों
की नामावली
संक्षिप्त में
निम्न प्रकार
हैः-
मद्वयं
भद्वयं चैव
ब्रत्रयं वचतुष्टकम्।
नालिंपाग्निपुराणानि
कूस्कं गरुड़मेव
च।।
(देवीभागवत
१।३)
अर्थात-
आदि
अक्षर म-
वाले
२, भ
-वाले
२, ब्र
-वाले
३, व
-वाले
४,ना-वाला
१, प-वाला
१,
अग्निपुराण
१,
कू-वाला
१,
स्क-वाला
१ और गरुणपुराण
१।
|